कद्दावर नेता व कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे सत्यपाल मलिक के अंतिम संस्कार में उन्हें राजकीय सम्मान नहीं प्रदान किया गया। इसे लेकर राजनैतिक हलकों व आम लोगों में आश्चर्य फैला हुआ है। उनके समर्थकों व उत्तर प्रदेश में इससे लोगों में भारी क्षोभ देखा जा रहा है। इसे ओछी राजनैतिक मानसिकता बतायी जा रही है। स्व सत्यपाल मलिक पांच राज्य जम्मू काश्मीर, गोवा, बिहार, मेघालय समेत एक अन्य राज्य के राज्यपाल, केंद्र सरकार में मंत्री, उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री, लोकसभा तथा राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं। ऐसे में उनके अंतिम संस्कार में राजकीय सम्मान न दिये जाने को राजनीति के स्तर को घटिया हो जाना बताया जा रहा है। लोगों व नेताओं का कहना है कि किसी का निधन होने के बाद लोग बर्षों पुरानी दुश्मनी भूल जाते हैं। लेकिन केंद्र व भाजपा उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने मरने के बाद भी दुश्मनी निभाई। इसकी कड़ी प्रतिक्रिया पूरे देश में विशेष कर जाट बहुल एरिया में देखने को मिल रही है। समर्थकों का यह भी आरोप है कि निधन के बाद दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल के का कमरा आधा घंटा में खाली करवा लिया गया जैसे सत्यपाल मलिक कोई लावारिस व्यक्ति थे।
बताया जाता है कि एक जमीन आवंटन बिल को लेकर सत्यपाल मलिक का विवाद भाजपा व भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से हुआ था। बताया जाता है कि जब स्व मलिक जम्मू काश्मीर के राज्यपाल थे लो एक जमीन बिल लाया गया। जिसमें यह था कि जो लोग सरकारी जमीन पर हैं उन्हें राशि लेकर उस जमीन को उन्हें आवंटित कर दिया जाएगा। उससे जो पैसा आयेगा उसे पावर प्रोजेक्ट में खर्च किया जाएगा। लेकिन बाद में जांच में पता चला कि केवल प्रभावशाली लोगों को जमीन एलाट की गयी है। इसे स्व मलिक ने रद्द कर दिया तथा इसकी शिकायत प्रधानमंत्री से की। साथ ही सत्यपाल मलिक ने जम्मू काश्मीर का राज्यपाल रहते यह आरोप लगाया कि एक टेंडर के लिए उन्हें 150 करोड़ रुपये के रिश्वत की पेशकश की गयी थी। इस टेंडर को उनहोने रद्द कर दिया तथा यह बात प्रधानमंत्री को भी बतायी। इसके बाद स्व मलिक का तबादला जम्मू काश्मीर से कर दिया गया। सत्यपाल मलिक ने आरोप लगाया था कि उनके जम्मू काश्मीर से हटने के बाद उक्त टेंडर को मंजूर कर लिया गया।
इसके बाद उनका भाजपा केंद्रीय नेतृत्व, प्रधानमंत्री व गृहमंत्री से विवाद हो गया। इसके बाद स्व मलिक ने किसान आंदोलन में किसानों तथा महिला पहलवान आंदोलन में महिला पहलवानों का समर्थन कर बयान दिया। सत्यप्रकाश मलिक ने आरोप लगाया था कि इसके बाद उन्हें जिस टेंडर को उन्होंने रद्द कर दिया था उस मामले में सीबीआई द्वारा उन्हें फंसाने की कोशिश की जा रही है। मरने से पूर्व स्व मलिक ने अपने एक फेसबुक पोस्ट में सारी बातों की जानकारी दी थी।
मामला जो भी हो लेकिन इतने अहम संवैधानिक पदों पर रहने वाले को मरने के बाद भी उससे दुश्मनी निकालना कहां तक उचित है। इस पर देश भर में चर्चा प्रारंभ हो गयी है। जो व्यक्ति प्रोटोकोल के हिसाब से मरने के बाद राजकीय सम्मान का हकदार था उसे राजकीय सम्मान से वंचित किया जाना कहां तक उचित है ।