परिसीमन में आदिवासी प्रतिनिधित्व की सुरक्षा की मांग, राष्ट्रपति को भेजी गई याचिका

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रांची (झारखंड) : झारखंड के अधिवक्ता एवं सरकारी अधिवक्ता (गवर्नमेंट प्लीडर) संजीव कुमार अम्बष्ठ ने भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक विस्तृत याचिका भेजकर झारखंड में अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की संवैधानिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है।

याचिका में कहा गया है कि झारखंड राज्य का गठन आदिवासी समाज की पहचान, संस्कृति, परंपरा, जल-जंगल-जमीन के अधिकारों और राजनीतिक आकांक्षाओं की रक्षा के उद्देश्य से किया गया था। राज्य का बड़ा हिस्सा संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत अधिसूचित क्षेत्रों में आता है, जहां आदिवासी समुदायों की ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

संजीव कुमार अम्बष्ठ ने अपनी याचिका में आशंका जताई है कि भविष्य में होने वाली परिसीमन प्रक्रिया यदि केवल जनसंख्या के आधार पर की जाती है, तो झारखंड विधानसभा और लोकसभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या कम हो सकती है। उन्होंने कहा कि पलायन, विस्थापन, शहरीकरण, औद्योगीकरण और खनन परियोजनाओं के कारण कई क्षेत्रों में आदिवासी आबादी का प्रतिशत प्रभावित हुआ है। ऐसे में राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी संविधान की मूल भावना के विपरीत होगी।

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 15(4), 16(4), 46, 244, 275, 330, 332, 338A और 339 का उल्लेख करते हुए आदिवासी समुदायों को विशेष संवैधानिक संरक्षण प्रदान करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।

प्रमुख मांगें

  • झारखंड में वर्तमान एसटी आरक्षित विधानसभा और लोकसभा सीटों की संख्या में कोई कमी न की जाए।

  • पांचवीं अनुसूची वाले राज्यों में आदिवासी प्रतिनिधित्व की सुरक्षा के लिए संविधान संशोधन किया जाए।

  • अनुसूचित क्षेत्रों में स्थित विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों को स्थायी रूप से एसटी के लिए आरक्षित रखने का प्रावधान किया जाए।

  • परिसीमन आयोग को जनसंख्या के साथ-साथ आदिवासी पहचान, सांस्कृतिक संरक्षण, स्वशासन, ऐतिहासिक वंचना और विस्थापन जैसे कारकों पर विचार करने का कानूनी दायित्व दिया जाए।

  • आरक्षित सीटों में किसी भी बदलाव से पहले जनजातीय सलाहकार परिषद, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग और ग्राम सभाओं से अनिवार्य परामर्श लिया जाए।

  • राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को बाध्यकारी अनुशंसा देने की संवैधानिक शक्ति प्रदान की जाए।

  • संसद द्वारा ऐसा विशेष कानून बनाया जाए, जिससे अनुसूचित क्षेत्रों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व केवल जनसंख्या अनुपात के आधार पर निर्धारित न हो।

याचिका में यह भी कहा गया है कि पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा कानून) का उद्देश्य आदिवासी स्वशासन को मजबूत करना है। यदि आरक्षित सीटों की संख्या घटती है, तो यह पेसा कानून और संविधान की पांचवीं अनुसूची की भावना को कमजोर करेगा।

संजीव कुमार अम्बष्ठ ने कहा कि झारखंड का निर्माण आदिवासी समाज के लंबे संघर्ष और बलिदान का परिणाम है। इसलिए उनकी राजनीतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व को कम करना राज्य गठन के मूल उद्देश्य के विपरीत होगा। उन्होंने राष्ट्रपति से इस विषय पर संवेदनशीलता के साथ विचार कर आवश्यक संवैधानिक और विधायी कदम उठाने का आग्रह किया है।