जून में उद्घाटन के दौरान मंत्री ने दिए थे सुधार के निर्देश, बारिश में फिर जलमग्न हुआ प्रतिमा स्थल
रामगढ़ कैंट, झारखंड : रामगढ़ में करोड़ों रुपये की लागत से तैयार किया गया नया प्रखंड-सह-अंचल कार्यालय भवन जहां आधुनिक सुविधाओं और भव्य निर्माण को लेकर चर्चा में है, वहीं इसी परिसर में स्थापित पंडित जवाहरलाल नेहरू की पुरानी प्रतिमा इन दिनों सरकारी व्यवस्था की अनदेखी का उदाहरण बनी हुई है। बारिश होते ही प्रतिमा के आसपास पानी और कीचड़ जमा हो जाता है। कई बार स्थिति ऐसी बन जाती है कि प्रतिमा का पूरा चबूतरा गंदे पानी से घिर जाता है।
नए भवन की चमक-दमक के बीच परिसर में मौजूद इस ऐतिहासिक प्रतिमा की बदहाल स्थिति लोगों को खटक रही है। स्थानीय लोगों का सवाल है कि जब नए भवन और परिसर का निर्माण किया जा रहा था, तब प्रतिमा स्थल की ऊंचाई और पानी की निकासी की समस्या को स्थायी रूप से क्यों नहीं सुलझाया गया ?
निर्माण के बाद बदली परिसर की ऊंचाई, प्रतिमा स्थल बना जलजमाव का शिकार
बताया जाता है कि नए प्रखंड-सह-अंचल कार्यालय के निर्माण के दौरान भवन और उसके आसपास के हिस्से को पहले की तुलना में काफी ऊंचा कर दिया गया। इसके कारण पुराना प्रतिमा स्थल अपेक्षाकृत नीचे रह गया।
बारिश का पानी आसपास के ऊंचे हिस्सों से बहकर नीचे स्थित प्रतिमा स्थल की ओर पहुंचता है। पर्याप्त जल निकासी नहीं होने के कारण वहां पानी जमा हो जाता है और इसके साथ कीचड़ भी फैल जाता है।
लोगों का कहना है कि यदि निर्माण के समय ही प्रतिमा स्थल को ऊंचा करने और नाली अथवा ड्रेनेज की व्यवस्था करने पर ध्यान दिया जाता, तो वर्तमान स्थिति पैदा नहीं होती।
उद्घाटन के समय मंत्री के सामने उठा था मामला
नए रामगढ़ प्रखंड-सह-अंचल कार्यालय भवन का उद्घाटन जून माह में ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने किया था। उद्घाटन कार्यक्रम के दौरान स्थानीय लोगों ने मंत्री का ध्यान परिसर में मौजूद नेहरू प्रतिमा की स्थिति की ओर भी दिलाया था।
स्थानीय जानकारी के अनुसार, मंत्री ने मौके पर ही संबंधित ठेकेदार को बुलाकर प्रतिमा को व्यवस्थित तरीके से स्थापित करने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद प्रतिमा स्थल की समस्या का स्थायी समाधान अब तक नहीं हो पाया है।
बारिश के साथ एक बार फिर वही स्थिति सामने आ गई है और प्रतिमा के आसपास पानी एवं कीचड़ जमा हो गया है।
चार दशक से अधिक पुरानी प्रतिमा, शिलापट्ट में दर्ज है इतिहास
प्रखंड कार्यालय के मुख्य प्रवेश द्वार और कार्यालय भवन के बीच स्थित पंडित जवाहरलाल नेहरू की प्रतिमा कोई नई स्थापना नहीं है। प्रतिमा के पास लगे शिलापट्ट के अनुसार इसका अनावरण वर्ष 1976 में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री बिंदेश्वरी दुबे द्वारा किया गया था।
इस लिहाज से प्रतिमा रामगढ़ के प्रशासनिक एवं सार्वजनिक जीवन के पुराने दौर से जुड़ी स्मृति है। यही वजह है कि स्थानीय लोगों का कहना है कि इसके संरक्षण को राजनीतिक नजरिए से नहीं, बल्कि ऐतिहासिक धरोहर और सार्वजनिक सम्मान के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।
राजनीति से अलग है सम्मान का सवाल
प्रतिमा को लेकर उठ रहे सवालों को किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध से जोड़कर देखने के बजाय मूल मुद्दा परिसर के रखरखाव और संवेदनशीलता का है।
एक ओर करोड़ों रुपये की लागत से आधुनिक कार्यालय भवन तैयार किया गया है, वहीं उसी परिसर में मौजूद दशकों पुरानी प्रतिमा के आसपास बारिश का पानी जमा होना निर्माण योजना और रखरखाव व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
लोगों का कहना है कि किसी भी महापुरुष की सार्वजनिक प्रतिमा के आसपास स्वच्छता, रोशनी, पहुंच मार्ग और जल निकासी जैसी बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित की जानी चाहिए।
कांग्रेस नेताओं की आवाजाही के बावजूद नहीं बदली तस्वीर
नए कार्यालय परिसर में जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की लगातार आवाजाही रहती है। वर्तमान रामगढ़ विधायक ममता देवी कांग्रेस से हैं और नए कार्यालय भवन में उनके लिए भी कक्ष की व्यवस्था की जा रही है।
इसके बावजूद प्रतिमा स्थल की मौजूदा स्थिति पर अब तक कोई ठोस पहल नहीं होने को लेकर स्थानीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं। लोगों का कहना है कि प्रतिदिन इस परिसर में आने वाले जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की नजर इस समस्या पर पड़नी चाहिए थी।
छोटी-सी पहल से सुधर सकती है तस्वीर
स्थानीय लोगों का मानना है कि प्रतिमा स्थल को ऊंचा कराना, आसपास पक्का फर्श बनाना और पानी की निकासी के लिए स्थायी नाला तैयार करना कोई असंभव काम नहीं है। इसके लिए बड़े बजट की जरूरत भी नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति और जिम्मेदारी की जरूरत है।
लोगों का कहना है कि जिस परिसर में करोड़ों रुपये की लागत से भवन तैयार किया गया, वहां ऐतिहासिक प्रतिमा को बारिश के पानी और कीचड़ से बचाने की व्यवस्था होना स्वाभाविक अपेक्षा है।
अब प्रशासन से कार्रवाई की उम्मीद
बारिश खत्म होने के बाद पानी और कीचड़ भले ही दिखाई न दें, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ तो अगली बारिश में यही स्थिति दोबारा सामने आ सकती है।
अब निगाहें जिला प्रशासन और संबंधित विभाग पर हैं कि क्या नेहरू प्रतिमा स्थल की ऊंचाई बढ़ाकर जल निकासी की स्थायी व्यवस्था की जाएगी या फिर यह ऐतिहासिक प्रतिमा हर बरसात में जलजमाव और उपेक्षा की तस्वीर बनती रहेगी।
विकास की पहचान केवल भव्य भवनों से नहीं होती। किसी परिसर में मौजूद ऐतिहासिक स्मृतियों का संरक्षण और सम्मान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। रामगढ़ की नेहरू प्रतिमा की मौजूदा स्थिति इसी संवेदनशीलता की परीक्षा ले रही है।