भगवान सर्वत्र हैं, उन्हें बाहर नहीं अपने हृदय में खोजें : पंडित प्रकाश चंद्र शास्त्री     

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रामगढ़ कैंट, झारखंड : झंडा चौक स्थित माता वैष्णो देवी मंदिर के सभागार में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में भक्ति और अध्यात्म की अविरल धारा बह रही है। दिल्ली से पधारे सुप्रसिद्ध कथावाचक पंडित प्रकाश चंद्र शास्त्री अपनी मधुर वाणी और भावपूर्ण प्रसंगों के माध्यम से श्रद्धालुओं को भक्तिरस में सराबोर कर रहे हैं। कथा प्रतिदिन दोपहर 3 बजे से शाम 7 बजे तक हो रही है। कथा के बाद आरती एवं प्रसाद वितरण किया जाता है। मुख्य यजमान अमित साहू एवं उनकी धर्मपत्नी सहित पूरा परिवार नियमित रूप से कथा श्रवण कर रहा है।

कथा के दौरान द्वितीय स्कंध का वर्णन करते हुए पंडित प्रकाश चंद्र शास्त्री ने कहा कि भगवान सर्वत्र हैं, इसलिए उन्हें केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि अपने हृदय में भी देखना चाहिए। उन्होंने राजा परीक्षित के प्रसंग के माध्यम से बताया कि भगवान की कथा निर्गुण और सगुण उपासना के बीच सेतु का कार्य करती है। श्रीमद्भागवत मनुष्य के भीतर छिपी आध्यात्मिक चेतना को जागृत कर परमात्मा के अनुभव का मार्ग दिखाती है।

उन्होंने कहा कि जिन कानों ने हरि कथा का श्रवण नहीं किया, उनका जीवन अधूरा है। कथा के दौरान श्री राधारानी के मंगलाचरण, सृष्टि की रचना तथा ब्रह्माजी द्वारा सृष्टि निर्माण का सुंदर वर्णन किया गया।

ध्रुव महाराज की अटूट भक्ति का प्रसंग श्रद्धालुओं के लिए विशेष प्रेरणादायक रहा। शास्त्री जी ने कहा कि दृढ़ संकल्प, सत्य और भक्ति के माध्यम से मनुष्य न केवल अपने जीवन को सार्थक बना सकता है, बल्कि समाज और कुल के कल्याण का मार्ग भी प्रशस्त कर सकता है।

कथा के अंत में भगवान नरसिंह की दिव्य झांकी प्रस्तुत की गई। झांकी के दर्शन कर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे और पूरा सभागार भगवान के जयकारों से गूंज उठा।

कथा का भावार्थ और संदेश बताते हुए पंडित प्रकाश चंद्र शास्त्री ने कहा कि श्रीमद्भागवत का मूल संदेश है कि परमात्मा कण-कण में विद्यमान हैं। श्रद्धा, प्रेम, भक्ति और निर्मल हृदय के माध्यम से उनका अनुभव किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि विपरीत परिस्थितियों में भी भगवान पर विश्वास बनाए रखना चाहिए। ध्रुव की दृढ़ता और परीक्षित की जिज्ञासा को अपनाकर मनुष्य प्रेम, करुणा, संयम और सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।