धनबाद (झारखंड) : नदी सूखना सभ्यता के लिए खतरा—राजेंद्र सिंह, आईआईटी (आईएसएम) में राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

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धनबाद, झारखंड : आईआईटी (आईएसएम) धनबाद में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन जल संकट और नदी संरक्षण के अहम संदेशों के साथ हुआ। संगोष्ठी के दूसरे दिन मुख्य वक्ता के रूप में पहुंचे देश के प्रख्यात पर्यावरणविद् और मैगसेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह ने कहा कि “जब भी कोई नदी सूखती है, वहां की सभ्यता खत्म होने लगती है और अपराध बढ़ते हैं।”

उन्होंने कहा कि आज जरूरत है नदी के आध्यात्मिक और प्राकृतिक स्वरूप को समझने की। “मिशन Y: नदी की भूमि का अधिग्रहण” विषय पर बोलते हुए उन्होंने चेताया कि भविष्य में जल संकट वैश्विक संघर्ष का कारण बन सकता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में लोकतंत्र पर कॉर्पोरेट और ठेकेदारी व्यवस्था का प्रभाव बढ़ रहा है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों का संतुलन बिगड़ रहा है।

राजेंद्र सिंह ने सुझाव दिया कि नदी क्षेत्रों को ग्रीन जोन, ब्लू जोन और रेड जोन में बांटकर संरक्षण की दिशा में काम करना चाहिए। उन्होंने अनियमित वर्षा, घटते भूजल स्तर और बदलते जलवायु पैटर्न को जल संकट का प्रमुख कारण बताया। उन्होंने यह भी कहा कि विज्ञान और तकनीक को जोड़कर ही टिकाऊ समाधान संभव है।

संगोष्ठी में गुरदीप सिंह (पूर्व कुलपति, विनोबा भावे विश्वविद्यालय) ने धनबाद, झारखंड में जल संकट की स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने बताया कि शहर में प्रतिदिन लगभग 83.5 मिलियन गैलन पानी की जरूरत है, जबकि आपूर्ति केवल 61 मिलियन गैलन ही हो पाती है।

उन्होंने खनन क्षेत्रों से निकलने वाले पानी के उचित ट्रीटमेंट पर जोर देते हुए कहा कि इससे पानी की कठोरता (हार्डनेस) कम की जा सकती है और इसे उपयोगी बनाया जा सकता है। साथ ही उन्होंने जॉन्डिस और कॉलरा जैसी बीमारियों के बढ़ते मामलों पर भी चिंता व्यक्त की।

संगोष्ठी के दौरान विभिन्न तकनीकी सत्रों में जल प्रबंधन, आर्द्रभूमि संरक्षण, जलविभाजन क्षेत्र की गतिशीलता, आरएस-जीआईएस तकनीक के उपयोग सहित कई महत्वपूर्ण विषयों पर विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे।

इस कार्यक्रम मेंजमशेदपुर पश्चिम के विधायक और दामोदर बचाओ आंदोलन के प्रणेता सरयू राय , पद्मश्री आरके सिन्हा, युगांतर भारती के अध्यक्ष अंशुल शरण समेत कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

दो दिवसीय इस संगोष्ठी में देश के कई प्रतिष्ठित संस्थानों—आईआईटी, विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लेकर जल संरक्षण और प्रबंधन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई।