नई दिल्ली /रामगढ़ (झारखंड) : आदिवासी (अनुसूचित जनजाति) समुदाय से जुड़े विचाराधीन कैदियों की लंबे समय से जारी न्यायिक हिरासत और दयनीय स्थिति को लेकर दायर एक महत्वपूर्ण याचिका पर राष्ट्रपति सचिवालय ने संज्ञान लिया है। राष्ट्रपति सचिवालय, नई दिल्ली द्वारा इस याचिका को उचित कार्रवाई एवं आवश्यक ध्यानाकर्षण के लिए संबंधित विभागों को अग्रेषित किया गया है।
यह याचिका रामगढ़ (झारखंड) के अधिवक्ता एवं सरकारी अधिवक्ता संजीव कुमार अम्बष्ठ द्वारा भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेजी गई थी। याचिका में विशेष रूप से मध्यप्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों में आदिवासी समुदाय के विचाराधीन बंदियों की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है।
राष्ट्रपति सचिवालय की अवर सचिव श्रीमती लक्ष्मी महाराबूशनम् द्वारा जारी पत्र में कहा गया है कि याचिका को संबंधित प्राधिकरण को आवश्यक कार्रवाई हेतु भेज दिया गया है तथा की गई कार्रवाई की सूचना सीधे याचिकाकर्ता को उपलब्ध कराई जाएगी।
याचिका में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया है कि देश की जेलों में लाखों विचाराधीन कैदी बंद हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत में लगभग 3.71 लाख से अधिक विचाराधीन कैदी हैं, जिनमें 39 हजार से अधिक अनुसूचित जनजाति समुदाय से संबंधित हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे गरीब एवं अशिक्षित आदिवासी बंदियों की है जो मामूली अपराधों में वर्षों से जेलों में बंद हैं।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि मध्यप्रदेश उन राज्यों में शामिल है जहाँ आदिवासी समुदाय से जुड़े मामलों एवं विचाराधीन कैदियों की संख्या अत्यधिक है। कई मामलों में बंदियों को इतनी लंबी अवधि तक जेल में रखा गया है, जितनी सजा संबंधित अपराध में निर्धारित भी नहीं है। गरीबी, जमानत राशि जमा नहीं कर पाना, प्रभावी कानूनी सहायता का अभाव, अशिक्षा तथा न्यायिक प्रक्रिया में देरी को इसके प्रमुख कारणों में बताया गया है।
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 21 एवं 39A का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि प्रत्येक नागरिक को समानता, जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा निःशुल्क कानूनी सहायता का अधिकार प्राप्त है। आदिवासी समुदाय के गरीब बंदियों की वर्तमान स्थिति इन संवैधानिक अधिकारों के विपरीत बताई गई है।
याचिका में राष्ट्रपति महोदया से मामूली अपराधों में बंद आदिवासी विचाराधीन कैदियों के मामलों की विशेष समीक्षा कराने, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 436A का प्रभावी पालन सुनिश्चित करने, अनुसूचित जनजाति बंदियों को निःशुल्क एवं प्रभावी कानूनी सहायता उपलब्ध कराने, लंबी न्यायिक हिरासत के मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए जमानत सुधार लागू करने तथा आदिवासी बंदियों के मामलों की निगरानी के लिए स्वतंत्र समीक्षा तंत्र गठित करने की मांग की गई है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि यह केवल कानूनी नहीं बल्कि मानवीय एवं संवैधानिक न्याय का विषय है। गरीब एवं वंचित आदिवासी नागरिक वर्षों तक बिना सुनवाई जेलों में बंद रहने को विवश हैं, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
राष्ट्रपति सचिवालय द्वारा इस मामले को संबंधित विभागों को भेजा जाना आदिवासी समुदाय के संवैधानिक अधिकारों और न्यायिक सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।