रामगढ़ , झारखंड : लातेहार जिले के मगध कोयला परियोजना क्षेत्र में पानी से भरे खदान के गड्ढे में डूबने से द्वारिका गंझू के तीन मासूम बच्चों की मौत के बाद खनन क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस हृदयविदारक घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया है और बंद एवं परित्यक्त खदानों की सुरक्षा को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
बरसात के मौसम में कोयला खदानों के पुराने और बंद पड़े गड्ढों में पानी भर जाने से वे बाहर से सामान्य तालाब की तरह दिखाई देते हैं, लेकिन वास्तव में बेहद गहरे और खतरनाक होते हैं। ऐसे जलभराव वाले गड्ढों में अनजान बच्चे, ग्रामीण, पशुपालक और मवेशी दुर्घटनाओं का शिकार होते रहे हैं।
अधिवक्ता एवं सरकारी अधिवक्ता (गवर्नमेंट प्लीडर) संजीव कुमार अम्बष्ठ ने इस घटना को गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौती बताते हुए कोल इंडिया लिमिटेड के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक को पत्र लिखकर देशभर की खदानों में व्यापक सुरक्षा अभियान चलाने की मांग की है।
उन्होंने कहा कि यह समस्या केवल झारखंड तक सीमित नहीं है। झारखंड के रामगढ़ जिले में भी बंद खदानों और असुरक्षित खनन क्षेत्रों में कई हादसे हो चुके हैं। हाल ही में रामगढ़, झारखंड के अर्गड्डा क्षेत्र में एक बंद खदान में जहरीली गैस और ऑक्सीजन की कमी के कारण चार लोगों की मौत हो गई थी। इसके अलावा खदान धंसने और खदान क्षेत्रों में गिरने की घटनाओं में भी कई लोगों की जान जा चुकी है।
श्री अम्बष्ठ ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल सहित अन्य खनन राज्यों में भी जलभराव वाले खदान गड्ढों में डूबने और असुरक्षित खदानों के कारण लगातार जनहानि की घटनाएं सामने आती रही हैं। उनका कहना है कि यह किसी एक राज्य की नहीं बल्कि पूरे देश के खनन क्षेत्रों से जुड़ी गंभीर समस्या है।
सुरक्षा के लिए रखीं प्रमुख मांगें
संजीव कुमार अम्बष्ठ ने कोल इंडिया लिमिटेड एवं उसकी सहायक कंपनियों से मांग की है कि:
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सभी बंद एवं खुली खदानों की तत्काल पहचान की जाए।
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खतरनाक गड्ढों को भरकर सुरक्षित बनाया जाए।
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जहां गड्ढे भरना संभव नहीं हो, वहां मजबूत फेंसिंग की जाए।
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स्थानीय भाषाओं में चेतावनी बोर्ड लगाए जाएं।
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रात्रि में खतरे के संकेत स्पष्ट दिखें, इसके लिए सोलर लाइट लगाई जाए।
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संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा गार्ड तैनात किए जाएं।
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मानसून से पहले नियमित सुरक्षा ऑडिट और निरीक्षण कराया जाए।
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गांवों, स्कूलों एवं आदिवासी बस्तियों में जागरूकता अभियान चलाया जाए।
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बचाव उपकरण एवं प्रशिक्षित राहत दल उपलब्ध रखे जाएं।
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दुर्घटना पीड़ित परिवारों को शीघ्र मुआवजा एवं सहायता प्रदान की जाए।