गैर-दलीय चुनाव, फिर भी दलों की लड़ाई : झारखंड  के पाकुड़–धनबाद में जीते बागियों पर भाजपा का ‘डैमेज कंट्रोल’

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 रांची / पाकुड़ / धनबाद : झारखंड राज्य में इस बार निकाय चुनाव गैर-दलीय आधार पर कराए गए, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग दिखी। लगभग सभी प्रमुख दलों ने अपने-अपने समर्थित प्रत्याशी उतारे, बड़े नेताओं ने खुलकर प्रचार किया और पार्टी लाइन के खिलाफ मैदान में उतरने वालों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई भी शुरू की गई।

इस पूरे घटनाक्रम में भारतीय जनता पार्टी सबसे आगे नजर आई। पार्टी के घोषित प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लड़ने या उनके विरुद्ध काम करने वाले नेताओं व कार्यकर्ताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए। राज्य भर में दर्जनों लोगों को नोटिस थमाए गए।

लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद एक दिलचस्प और विरोधाभासी तस्वीर सामने आई — जीतने वाले बागी उम्मीदवारों को ही अब पार्टी के वरिष्ठ नेता सार्वजनिक रूप से बधाई देते दिख रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में इसे साफ तौर पर डैमेज कंट्रोल माना जा रहा है।

पाकुड़ नगर परिषद का मामला बना चर्चा का केंद्र 

पाकुड़ नगर परिषद क्षेत्र (पाकुड़ जिला, झारखंड) में भाजपा की बागी उम्मीदवार

शबरी पाल ने 7,816 मत प्राप्त कर जीत दर्ज की।

वहीं भाजपा समर्थित प्रत्याशी
शंपा शाह को केवल 3,730 मत मिले और उन्हें तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा।

सबसे रोचक पहलू यह है कि शबरी पाल को चुनाव से पहले ही पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में कारण बताओ नोटिस दिया गया था। यह नोटिस
भाजपा के प्रदेश महामंत्री (मुख्यालय प्रभारी) सह राज्यसभा सांसद
प्रदीप वर्मा द्वारा 12 फरवरी को जारी किया गया था।

नोटिस में शबरी पाल के कृत्य को अनुशासनहीनता की श्रेणी में बताया गया था और स्पष्टीकरण मांगा गया था।
लेकिन जैसे ही शबरी पाल चुनाव जीत गईं, सबसे पहले सोशल मीडिया पर उन्हें बधाई देने वालों में खुद प्रदीप वर्मा शामिल रहे।

यानी, जो उम्मीदवार चुनाव तक पार्टी के लिए अनुशासनहीन थे, वही जीतते ही राजनीतिक रूप से स्वीकार्य बन गए।

धनबाद में भी दोहराई गई वही तस्वीर  

यही हाल धनबाद जिला, झारखंड में भी देखने को मिला। यहां जीत दर्ज करने के बाद

संजीव सिंह को लेकर भी पार्टी रुख में अचानक नरमी दिखाई दी।

सूत्रों के अनुसार, उनकी जीत के बाद भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं के साथ-साथ धनबाद के विधायक तक ने सोशल मीडिया के माध्यम से उन्हें बधाई देना शुरू कर दिया।

गैर-दलीय चुनाव में दलीय राजनीति क्यों 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब चुनाव पूरी तरह गैर-दलीय आधार पर हो रहे थे, तो सभी दलों को अपने कार्यकर्ताओं को खुली छूट देनी चाहिए थी।
लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसा नहीं हुआ।

भाजपा के बड़े नेताओं ने कई सीटों पर खुलकर प्रचार किया, पार्टी समर्थित प्रत्याशियों को आगे बढ़ाया, लेकिन कई जगहों पर पार्टी समर्थित उम्मीदवार हार गए और बागी प्रत्याशी जीत गए।

अब उन्हीं बागियों को अपना बताकर पार्टी नेतृत्व यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि जनादेश पार्टी के पक्ष में रहा।

सबसे ज्यादा किरकिरी भाजपा की

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक असहज स्थिति भाजपा की मानी जा रही है, क्योंकि—

  • पहले पार्टी विरोधी बताकर कारण बताओ नोटिस जारी किए गए

  • फिर उन्हीं उम्मीदवारों को जीत के बाद सार्वजनिक रूप से बधाई दी गई

  • और अब उन्हें अपने पक्ष में बताकर संगठन की मजबूती का दावा किया जा रहा है

गैर-दलीय चुनाव के मंच पर यह पूरा घटनाक्रम झारखंड  के पाकुड़ और धनबाद जिलों में राजनीतिक विरोधाभास का प्रतीक बन गया है।