झारखंड में आदिवासी भूमि ऑडिट पर बढ़ा विवाद, महालेखा परीक्षक से हस्तक्षेप रोकने की मांग

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रामगढ / रांची (झारखंड) : आदिवासी भूमि के प्रबंधन और हस्तांतरण से जुड़े मामलों की लेखा जांच (ऑडिट) को लेकर झारखंड में विवाद गहराता जा रहा है। रामगढ़ के जी.पी. संजीव कुमार अम्बष्ठ ने इस मुद्दे पर भारत के Comptroller and Auditor General of India (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) को पत्र लिखकर झारखंड के महालेखाकार (एजी) की भूमिका पर सवाल उठाए हैं और हस्तक्षेप रोकने की मांग की है।

पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आदिवासी भूमि से जुड़े मामले Chotanagpur Tenancy Act, 1908 (छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम) और Santhal Parganas Tenancy Act (संताल परगना काश्तकारी अधिनियम) के तहत नियंत्रित होते हैं, जिनकी प्रकृति अर्द्ध-न्यायिक है। ऐसे मामलों में लिए गए निर्णयों की समीक्षा केवल सक्षम राजस्व प्राधिकारियों—जैसे आयुक्त और राजस्व बोर्ड—द्वारा ही की जा सकती है।

विशेष रूप से सीएनटी एक्ट की धारा 49 और 71ए का हवाला देते हुए कहा गया है कि उपायुक्त द्वारा पारित आदेशों की जांच या पुनरावलोकन किसी अन्य संस्था द्वारा किया जाना विधिक दायरे से बाहर है। ऐसे में महालेखाकार द्वारा इन मामलों की लेखा जांच करना न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप के समान माना जा सकता है।

पत्र में यह भी तर्क दिया गया है कि ये मामले “भूमि अनुदान” की श्रेणी में नहीं आते, इसलिए Comptroller and Auditor General’s Act, 1971 (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक अधिनियम, 1971) के तहत इनकी लेखा जांच नहीं की जा सकती।

संजीव कुमार अम्बष्ठ ने महालेखा परीक्षक से अनुरोध किया है कि वे इस विषय पर स्पष्ट निर्देश जारी करें, ताकि झारखंड के महालेखाकार को ऐसे मामलों में हस्तक्षेप से रोका जा सके और विधिक प्रक्रिया की मर्यादा तथा अधिकार क्षेत्र की सीमाएं बनी रहें।

इस पूरे प्रकरण ने राज्य में प्रशासनिक और कानूनी हलकों में नई बहस छेड़ दी है। जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है, जिससे आदिवासी भूमि से जुड़े कानूनों की व्याख्या और अधिकार क्षेत्र को लेकर व्यापक चर्चा संभव है।