9 मई को गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर की जयंती मनाई गयी । उन पर पर गूगल, सोशल मीडिया व अन्य श्रोतों के सहयोग से मिली जानकारी । हालांकि गुरुदेव का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता में हुआ था, लेकिन बंगाली पंचांग के अनुसार उनकी जयंती 25वें बोइशाख को मनाई जाती है, जो इस वर्ष 9 मई को पड़ी।
रांची/हजारीबाग (झारखंड) : नोबेल पुरस्कार से सम्मानित विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर का झारखंड से संबंध केवल स्मृतियों तक सीमित नहीं था, बल्कि यह उनकी साहित्यिक और आध्यात्मिक यात्रा का महत्वपूर्ण अध्याय रहा है। 9 मई को मनाई जाने वाली रवींद्र जयंती के अवसर पर हजारीबाग और रांची से जुड़ी उनकी यादें एक बार फिर जीवंत हो उठती हैं।
हालांकि गुरुदेव का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता में हुआ था, लेकिन बंगाली पंचांग के अनुसार उनकी जयंती 25वें बोइशाख को मनाई जाती है, जो इस वर्ष 9 मई को पड़ी।
हजारीबाग की वादियों में जन्मीं अमर रचनाएं
हजारीबाग से गुरुदेव का विशेष लगाव था। उन्होंने 1885 और 1903 में यहां प्रवास किया। उस समय हजारीबाग की प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण और पहाड़ी वादियों ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया।
कहा जाता है कि उनकी प्रसिद्ध कृति नौकाडूबी का प्रारंभिक भाग यहीं लिखा गया था। इसी वातावरण ने पोस्टमास्टर जैसी कालजयी रचनाओं की सृजन-भूमि तैयार की।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यदि उस समय ब्रिटिश सरकार ने पर्याप्त भूमि उपलब्ध कराई होती, तो विश्व-भारती विश्वविद्यालय की स्थापना संभवतः हजारीबाग में ही होती।
रांची की टैगोर हिल : सृजन और साधना का स्थल
रांची के मोराबादी क्षेत्र में स्थित टैगोर हिल आज भी गुरुदेव के परिवार की विरासत को संजोए हुए है।
गुरुदेव के बड़े भाई ज्योतिरींद्रनाथ ठाकुर ने 1908 में इस पहाड़ी पर निवास बनाया, जिसे “शांतिधाम” नाम दिया गया। उन्होंने यहां “ब्रह्मस्थल” का भी निर्माण कराया।
मान्यता है कि रवींद्रनाथ टैगोर अपने भाई से मिलने अक्सर रांची आते थे और इस शांत पहाड़ी पर बैठकर साहित्य चिंतन तथा रचनात्मक साधना करते थे।
आज भी जीवित है गुरुदेव की विरासत
टैगोर हिल आज रांची का प्रमुख पर्यटन और सांस्कृतिक स्थल है। पहाड़ी की चोटी पर स्थित शांतिधाम और आसपास का वातावरण आज भी गुरुदेव की स्मृतियों को जीवंत बनाए हुए है।
वहीं हजारीबाग की वादियां इस बात की गवाह हैं कि झारखंड की प्रकृति ने विश्वकवि की संवेदनाओं और सृजनशीलता को नई दिशा दी।
जनजातीय संस्कृति और प्रकृति से विशेष लगाव
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने झारखंड की प्राकृतिक छटा और यहां के जनजातीय समाज की जीवन शैली की हमेशा सराहना की। यही कारण है कि झारखंड की धरती उनके साहित्यिक जीवन के प्रेरणास्रोतों में शामिल रही।
रवींद्र जयंती के अवसर पर झारखंड के लिए यह गौरव का विषय है कि विश्वकवि की कई अमर रचनाओं और पारिवारिक स्मृतियों का इतिहास इस राज्य की मिट्टी से गहराई से जुड़ा हुआ है।