9 मई गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर की जयंती पर गूगल, सोशल मीडिया व अन्य श्रोतों के सहयोग से। हालांकि गुरुदेव का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता में हुआ था, लेकिन बंगाली पंचांग के अनुसार उनकी जयंती 25वें बोइशाख को मनाई जाती है, जो इस वर्ष 9 मई को पड़ी।
सरायकेला-खरसावां (झारखंड) : साहित्य, संगीत और कला के अप्रतिम साधक रवींद्रनाथ टैगोर का भारतीय लोककलाओं से गहरा लगाव था। यही कारण था कि जब उन्होंने सरायकेला छऊ नृत्य के माध्यम से अपनी ही रचना को मंच पर साकार होते देखा, तो वे भाव-विभोर हो उठे। कलाकारों की अद्भुत प्रस्तुति ने गुरुदेव को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने खुलकर उनकी प्रशंसा की।
9 मई को गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती पर यह ऐतिहासिक प्रसंग आज भी कला और साहित्य के अद्भुत संगम की याद दिलाता है।
हालांकि गुरुदेव का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता में हुआ था, लेकिन बंगाली पंचांग के अनुसार उनकी जयंती 25वें बोइशाख को मनाई जाती है, जो इस वर्ष 9 मई को पड़ी।
1941 में शांतिनिकेतन में हुआ था ऐतिहासिक प्रदर्शन
वर्ष 1941 में शांतिनिकेतन में सरायकेला राजघराने के कुमार विजय प्रताप सिंहदेव के नेतृत्व में रॉयल छऊ डांस ग्रुप ने गुरुदेव के समक्ष विशेष प्रस्तुति दी थी। कलाकारों ने टैगोर की प्रसिद्ध काव्य रचना विदाई अभिशाप पर आधारित “कच और देवयानी” की कथा को छऊ नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत किया।
मुखौटों, भाव-भंगिमाओं और लयबद्ध गतियों से सजी इस प्रस्तुति ने साहित्य को सजीव दृश्य रूप दे दिया। इसे देखकर गुरुदेव गहरे भावुक हो गए और कलाकारों को भरपूर सराहना दी।
‘भिक्षुक’ नृत्य ने भी जीता था मन
“कच और देवयानी” के अलावा कलाकारों ने “भिक्षुक” नृत्य भी प्रस्तुत किया था। दोनों प्रस्तुतियों ने गुरुदेव पर अमिट छाप छोड़ी। उस ऐतिहासिक अवसर की एक दुर्लभ तस्वीर आज भी सरायकेला के छऊ डांस सेंटर में सुरक्षित है, जो इस गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत की गवाही देती है।
टैगोर की रचनाओं में भी मिलता है सरायकेला छऊ का उल्लेख
गुरुदेव की एक पुस्तक में भी सरायकेला छऊ का उल्लेख मिलता है। यह प्रमाण है कि टैगोर इस नृत्य शैली से कितने प्रभावित थे।
तपन पटनायक बताते हैं कि उन्होंने 1980 के दशक में सरायकेला, मानभूम और मयूरभंज—छऊ की तीनों प्रमुख शैलियों को मिलाकर “कच और देवयानी” पर नई कोरियोग्राफी तैयार की थी, जिसे देश के कई प्रतिष्ठित मंचों पर प्रस्तुत किया गया।
साहित्य और लोककला का अनुपम संगम
रवींद्रनाथ टैगोर और सरायकेला छऊ का यह ऐतिहासिक जुड़ाव केवल एक प्रस्तुति भर नहीं था, बल्कि भारतीय साहित्य और लोककला के अद्भुत समन्वय का सशक्त उदाहरण है। यह घटना आज भी झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय पहचान दिलाने वाले गौरवपूर्ण अध्याय के रूप में याद की जाती है।