नई दिल्ली : नागरी लिपि परिषद्, नई दिल्ली के सत्प्रेरक आचार्य विनोबा भावे की 131वीं जन्म-जयंती एवं ‘नागरी दिवस’ के अवसर पर 11 सितंबर 2026 को अंतरराष्ट्रीय नागरी लिपि आभासी कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन में देश-विदेश से जुड़े साहित्यकारों, कवियों, विद्वानों और नागरी लिपि-प्रेमियों ने अपनी रचनात्मक सहभागिता से कार्यक्रम को गरिमा प्रदान की।
कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. शारदा प्रसाद ने की। डॉ. सोमनाथ काशीनाथ मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, जबकि नागरी लिपि परिषद् के महामंत्री डॉ. हरिसिंह पाल का सान्निध्य प्राप्त हुआ। कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन परिषद् के छात्र प्रतिनिधि राजेंद्र ने किया।
नागरी वंदना से हुआ सम्मेलन का शुभारंभ
सम्मेलन का शुभारंभ वरिष्ठ साहित्यकार बाबा कानपुरी द्वारा प्रस्तुत नागरी वंदना से हुआ। उन्होंने अपनी रचना के माध्यम से नागरी लिपि की प्राचीनता, वैज्ञानिकता, सांस्कृतिक महत्ता और विश्वव्यापी स्वरूप को अभिव्यक्त किया। उनकी पंक्तियों—“देवनागरी, विश्वनागरी, इस पर है हमको अभिमान”—ने कार्यक्रम के मूल भाव को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
इसके पश्चात नागरी लिपि परिषद् के संयुक्त मंत्री अरुण कुमार पासवान ने अपनी रचना ‘नागरी का करें वंदन’ प्रस्तुत की। उन्होंने नागरी को ब्राह्मी की सुयोग्य पुत्री तथा वैज्ञानिक एवं ध्वन्यात्मक लिपि बताते हुए हिंदी, संस्कृत, मराठी, कोंकणी, बोडो, नेपाली, नागपुरी, बघेली, संथाली, मगही, अंगिका और गढ़वाली सहित अनेक भाषाओं एवं बोलियों के विकास में उसके योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने फिजी, मॉरीशस, सूरीनाम और त्रिनिदाद तक नागरी लिपि की व्यापक उपस्थिति का भी उल्लेख किया।
डिजिटल युग में भी नागरी लिपि की प्रासंगिकता
मुख्य अतिथि डॉ. सोमनाथ काशीनाथ ने ‘शब्दों का सूर्यबद्ध हिंदी और नागरी का आलोक’ शीर्षक रचना प्रस्तुत की। उन्होंने नागरी लिपि को वह दृढ़ धरातल बताया, जिस पर ध्वनियां आकार ग्रहण करती हैं। उनकी रचना में स्वर को जलधारा, व्यंजन को पर्वत-शिखर और शिरोरेखा को अक्षरों को एक प्रवाह में बांधने वाली नदी के रूप में चित्रित किया गया।
उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में भी नागरी लिपि परंपरा, स्मृति, अस्मिता और सृजन की जीवंत ज्योति के रूप में प्रकाशित हो रही है।
कविताओं में सामाजिक सरोकार और हिंदी के प्रति प्रेम
काव्य-पाठ के क्रम में गजराज सिंह ने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और निम्न आयवर्ग की समस्याओं को केंद्र में रखकर सामाजिक सरोकारों से युक्त कविता प्रस्तुत की। डॉ. शिप्रा मिश्रा ने हिंदी के प्रति अपनी भावपूर्ण रचना सुनाते हुए हिंदी को माथे की बिंदी तथा भारतीय साहित्यिक-सांस्कृतिक परंपरा की संवाहिका बताया। उन्होंने तुलसी, मीरा, रैदास, सूरदास और कबीर की परंपरा का स्मरण करते हुए हिंदी के प्रति आत्मीय भाव प्रकट किए।
इंदौर से जुड़े मध्य भारत हिंदी प्रचार समिति तथा ‘वीणा’ पत्रिका से संबद्ध हरेराम वाजपेयी ने ‘देवनागरी’ शीर्षक कविता प्रस्तुत की। उन्होंने नागरी को अपनी साहित्यिक यात्रा, संवेदना और सृजनशीलता का आधार बताते हुए उसे जीवन की प्रत्येक सांस समर्पित करने का भाव व्यक्त किया। उनकी पंक्तियों—“शत-शत प्रणाम तुम्हें, ओ हिंदी! ओ देवनागरी!”—का उपस्थित साहित्यकारों ने हर्षपूर्वक स्वागत किया।
विनोबा भावे के सर्वोदय और ‘जय जगत्’ के संदेश का स्मरण
आचार्य विनोबा भावे को समर्पित रचनाओं में उनके सर्वोदय, भूदान, जनसेवा, सामाजिक समानता और ‘जय जगत्’ के संदेश का स्मरण किया गया। एक प्रस्तुति में उन्हें गांधीजी का सच्चा अनुयायी और दीन-दुखियों का सेवक बताया गया।
लता जी ने ‘सर्वोदय’ शीर्षक कविता के माध्यम से विनोबा भावे को सर्वोदय आंदोलन के प्रणेता, लोकनायक, स्वतंत्रता सेनानी और मानव-समानता के समर्थक के रूप में नमन किया।
इसके साथ ही डॉ. अजय कुमार ओझा, श्री मोहन द्विवेदी, डॉ. अपराजिता शर्मा, डॉ. शिप्रा एवं संगीता जी ने भी अपने मधुर भावों में नागरी लिपि को समर्पित सुंदर कविताएं प्रस्तुत कीं।
कजरी गीतों और ‘एक रोटी का बयान’ ने छुआ मन
सम्मेलन में प्रस्तुत कजरी गीतों ने ग्रामीण जीवन, विस्थापन, रोजी-रोटी के संघर्ष, माता-पिता से दूरी, सावन की स्मृतियों और बाढ़ से प्रभावित जनजीवन की पीड़ा को स्वर दिया।
वहीं राजेंद्र द्वारा प्रस्तुत ‘एक रोटी का बयान’ कविता ने श्रमिक जीवन, भूख, गरीबी और सामाजिक विषमता का मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया। कविता में मजदूर के श्रम से महानगरों के खड़े होने और उसी मजदूर के पास सुरक्षित छत तथा भरपेट भोजन न होने की विडंबना को प्रभावपूर्ण ढंग से अभिव्यक्त किया गया।
कार्यक्रम में पलक मिश्रा, उचित कुमार सहित अन्य कवियों एवं शोधार्थियों की गरिमामयी उपस्थिति रही।
नागरी के संरक्षण और वैश्विक प्रसार पर जोर
अपने सान्निध्य वक्तव्य में डॉ. हरिसिंह पाल ने नागरी लिपि के प्रचार-प्रसार, संरक्षण और वैश्विक स्वीकार्यता की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
अध्यक्षता कर रहीं डॉ. शारदा प्रसाद ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में विनोबा भावे की जयंती पर सभी को शुभकामनाएं दीं और सम्मेलन में प्रस्तुत सभी कविताओं का समाहार प्रस्तुत किया। उन्होंने नागरी लिपि को भारतीय भाषाओं, साहित्य और सांस्कृतिक एकता की सशक्त संवाहिका बताते हुए अपनी नागरी लिपि वंदना “जय हे नागरी प्रभा पुंज, करते हम तेरा नित वंदन” तथा ‘भात की सुगंध’ शीर्षक यथार्थवादी कविता प्रस्तुत की।
नागरी विविध भाषाओं और संस्कृतियों को जोड़ने वाला सेतु : राजेंद्र
कार्यक्रम के संयोजक एवं संचालक राजेंद्र ने सभी अतिथियों और रचनाकारों का स्वागत करते हुए कहा कि नागरी केवल लेखन की पद्धति नहीं, बल्कि भारत की विविध भाषाओं, साहित्यिक परंपराओं और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को जोड़ने वाला सेतु है। उन्होंने सभी प्रतिभागियों को क्रमपूर्वक काव्य-पाठ के लिए आमंत्रित करते हुए कार्यक्रम का सुचारु संचालन किया।
अंत में नागरी लिपि परिषद् के कार्यालय सहायक कृष्णा कर्तव्य ने अध्यक्ष, मुख्य अतिथि, सान्निध्य प्रदान करने वाले विद्वानों, कवियों, कवयित्रियों, साहित्यकारों एवं देश-विदेश से जुड़े समस्त श्रोताओं के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।
नागरी लिपि के संरक्षण, संवर्धन और वैश्विक प्रसार के संकल्प के साथ अंतरराष्ट्रीय आभासी कवि सम्मेलन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।