नई दिल्ली : भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में एक और बड़ा बदलाव संभावित है। वित्त मंत्रालय दो प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों — यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (यूबीआई) और बैंक ऑफ इंडिया (बीओआई) — के विलय पर विचार कर रहा है। अगर यह प्रस्ताव साकार होता है, तो नया गठित बैंक परिसंपत्ति आधार (एसेट बेस) के लिहाज से ₹25.67 लाख करोड़ रुपये का हो जाएगा, जिससे यह भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा सरकारी बैंक बन जाएगा।
सरकार की रणनीति के तहत बड़ा कदम
सरकार की योजना कम लेकिन मजबूत सार्वजनिक बैंकों की संरचना तैयार करने की है, ताकि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें। सूत्रों के अनुसार, वित्त मंत्रालय में चल रही चर्चा में मुंबई मुख्यालय वाले इन दोनों बैंकों का विलय प्रमुख विषयों में शामिल है।
वर्तमान में बैंक ऑफ बड़ौदा (बीओबी) देश का दूसरा सबसे बड़ा सरकारी बैंक है, जिसके पास 30 जून 2025 तक ₹18.62 लाख करोड़ रुपये की परिसंपत्तियाँ हैं। यदि यूनियन बैंक और बैंक ऑफ इंडिया का विलय होता है, तो संयुक्त इकाई परिसंपत्तियों के मामले में एसबीआई के बाद दूसरे स्थान पर आ जाएगी।
इतिहास और पृष्ठभूमि
वर्ष 2019-20 में सरकार ने दस सार्वजनिक बैंकों को चार इकाइयों में समेकित किया था, जिससे सरकारी बैंकों की संख्या 27 से घटकर 12 रह गई थी। अब यूनियन बैंक और बैंक ऑफ इंडिया के विलय से यह संख्या और कम हो जाएगी।
विलय के बाद बनने वाला नया बैंक लगभग 10,000 शाखाओं और 1 लाख से अधिक कर्मचारियों वाला होगा। इससे ऋण वृद्धि, ऋण वितरण की गति और बैंकिंग सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार आने की उम्मीद है।
चुनौतियां और संभावित असर
विलय की राह आसान नहीं मानी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों बैंकों के नियामकीय ढांचे, तकनीकी प्रणाली, मानव संसाधन प्रबंधन और ग्राहक डेटा का एकीकरण बड़ी चुनौती हो सकता है।
कर्मचारी संगठनों ने भी पहले संकेत दिए हैं कि विलय से रोजगार और ग्रामीण बैंकिंग प्रभावित हो सकती है। इसलिए सरकार को इस दिशा में अत्यंत सावधानी बरतनी होगी।
आगे की संभावनाएं
वित्त मंत्रालय इसके अलावा इंडियन बैंक और इंडियन ओवरसीज बैंक के विलय पर भी विचार कर रहा है। वहीं, छोटे सार्वजनिक बैंकों जैसे पंजाब एंड सिंध बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र को भविष्य में निजीकरण के लिए तैयार किया जा सकता है।
फिलहाल यूनियन बैंक और बैंक ऑफ इंडिया के विलय को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन सूत्रों के अनुसार इस पर मंत्रालय में उच्च-स्तरीय चर्चा जारी है।
यह कदम भारत की बैंकिंग प्रणाली को और सुदृढ़, प्रतिस्पर्धी और वैश्विक स्तर पर सक्षम बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हो सकता है।
साभार: डीएएस दिल्ली