जोधपुर में रावण को दामाद माना जाता है, विजया दशमी के दिन शोक मनाया जाता है 

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परंपरा मान्यता और मंडोर से रावण की जुड़ी लोककथाएँ

नीरज अमिताभ 

जोधपुर / मंडोर : विजया दशमी के दिन देश भर में रावण दहन किया जाएगा। लेकिन कई रोचक तथ्य भी रावण को लेकर मौजूद हैं। इस संबंध में एक मान्यता व लोककथाओं के अनुसार राजस्थान के जोधपुर में रावण का ससुराल था, ऐसा माना जाता है। कहा जाता है कि राजस्थान के मंडोर में महारानी मंदोदरी  का मायका था। यहां रावण का मंदिर है तथा यहां विजया दशमी के दिन रावण दहन नही कर कुछ  समुदाय  द्वारा शोक मनाया जाता है।

राजस्थानी लोकविश्वास और रामायण-कथाओं के लोकरूपों के बीच जो अनोखा मिलन दिखता है, वह है जोधपुर के पास स्थित मंडोर का रावण और उनकी पत्नी मंदोदरी से जुड़ा संबंध। स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक़ मंडोर को मंदोदरी का मायका माना जाता रहा है और यहां रावण से जुड़ी परंपराएँ आज भी जीवित हैं — कुछ समुदायों के लिए वे नकारात्मक नायक नहीं, बल्कि अपने वंश के पूर्वज के रूप में पूजनीय हैं।

राजस्थान के जोधपुर में ऐसी मान्यता है कि रावण ने अपनी पत्नी मंदोदरी के साथ सात फेरे मंडोर में लिए थे । मंडोर को रावण का ससुराल माना जाता है, जहां मंदोदरी का पीहर था. कहा जाता है कि रावण की मृत्यु के बाद उनके वंशज भी लंका से यहां आकर बसे थे । गोधा श्रीमाली ब्राह्मण समाज के लोग आज भी रावण को अपना दामाद मानते हैं । उनके अनुसार रावण एक महान संगीतज्ञ विद्वान और ज्योतिष पुरुष थे ।  जोधपुर के मेहरानगढ़ किला रोड पर स्थित मंदिर में रावण और मंदोदरी की मूर्ती लगी है ।

मंडोर : इतिहास और लोककथा

मंडोर का प्राचीन किला और मंडोर गार्डन्स ऐतिहासिक दृष्टि से प्रसिद्ध हैं। लोककथाओं में यह कहा जाता है कि मंदोदरी, रावण की पत्नी, मूलत: मंडोर से थीं और इसी कारण रावण को कई स्थानीय समूहों द्वारा ‘ससुराल का पुत्रवाचक’ माना जाता है। इस मान्यता का संकेत मंडोर के कुछ स्थलों—जैसे कहा जाने वाली चंवरी (विवाह-स्थल) और स्थानीय स्मृतियों—से मिलता है। ऐतिहासिक अभिलेख सीमित हैं, इसलिए ये बातें मुख्यतः जनश्रुति और लोककथाओं पर आधारित मानी जाती हैं।

परंपरा : पूजा, शोक और वंशजों के दावे

जोधपुर में कुछ शाही/ब्राह्मण समुदाय — विशेषकर शृमाली  ब्राह्मणों के कुछ उपकुल  जैसे दावे / मुद्गल खुद  को रावण का वंशज मानते हैं। दशहरा के दिन इन समुदायों की परंपरा देश के अधिकांश हिस्सों से अलग होती है: जहाँ अक्सर रावण के पुतले दहन के साथ विजय-उत्सव मनाया जाता है, वहीं जोधपुर के इन परिवारों में रावण का दहन न कर उनकी स्मृति में शोक या श्राद्ध-समारोह होते हैं और कुछ स्थानों पर रावण की पूजा भी की जाती है। इस व्यवहार का समृद्ध वृहत प्रमाण स्थानीय रिपोर्टों और यात्रावृत्तों में मिलता है।

मंडोर में रावण का मंदिर और दर्शनीय स्थल

मंडोर गार्डन्स में स्थानीय रूप से दर्शनीय कुछ संरचनाओं में रावण से जुड़ा एक मंदिर तथा उससे जुड़ी कथाएँ भी दर्शनीय हैं। कुछ समाचार और यात्रा लेखों में मंडोर के उन स्थलों का ज़िक्र मिलता है जहाँ रावण/मंदोदरी से जुड़ी कहानियाँ स्थानीय पर्यटन का भाग बनी हुई हैं।  मंडोर के कुछ हिस्सों में रावण की प्रतिमा और पूजा-स्थल मौजूद हैं।

सांस्कृतिक महत्व और पर्यटन

यह स्थानीय परंपरा रामायण की एकरूपी व्याख्या को चुनौती देती है और दर्शाती है कि किस प्रकार स्थानीय इतिहास-याद और सामुदायिक पहचान महाकाव्यात्मक पात्रों के साथ जुड़ कर स्थानीय रीति-रिवाज बनाते हैं। मंडोर गार्डन्स अब न केवल ऐतिहासिक स्मारक हैं बल्कि ऐसे अनूठे लोकविश्वासों के कारण पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र भी हैं — जहाँ आगंतुक इतिहास, स्थापत्य और लोककथाओं का मिश्रण देख पाते हैं।

लेख विभिन्न रिपोर्टों व लोककथाओं पर आधारित है ।