“दीपों का यह पर्व निराला — डॉ. शारदा प्रसाद की दीपावली कविता”

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दीपावली विशेष कविता
✍️ डॉ. शारदा प्रसाद, कवयित्री, समीक्षक एवं पूर्व प्राचार्या — रामगढ़ महाविद्यालय, रामगढ़ कैंट, झारखंड, भारत

दीपों का यह पर्व निराला
घर-आंगन जगमग होता है,
हर ओर उजाला होता है,
छिपकर अंधियारा रोता है!!

लक्ष्मी-गणेश की पूजा कर
सुख-सौभाग्य पाते हैं,
खील-बताशे-नवान्न-मिठाई,
प्रेम से भोग लगाते हैं!!

मिट्टी का दीया और बिजली की लड़ी सजाते हैं,
रंग-बिरंगी सुंदर रंगोली मन-प्राणों को भाते हैं!!

नए-नए परिधान पहन कर
बच्चे खूब इतराते हैं,
पटाखा-छुरछुरिया-फुलझड़ी
मिलजुल कर जलाते हैं!!

तम का कहीं न नामोनिशान,
जगमग जग सारा होता है,
मन से मन के दीप जले तो
जीवन सुखदायी होता है!!

प्रेम-सौहार्द के दीप जलाएं,
नफरत के तम को दूर भगाएं,
संस्कृति के अनुपम चंदन का
सकल विश्व को भेंट चढ़ाएं!!

दीवाली बस त्योहार नहीं है,
संस्कृति सुंदर पुरातन है,
‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ का
मूल-मंत्र शुचि पावन है!!