रामगढ, झारखंड : ओशो फ्रेगरेंस द्वारा आयोजित तीन दिवसीय ध्यान योग कार्यक्रम का शुभारंभ आज उत्साह और आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ हुआ। पहले सत्र में आचार्य दिगंबर ने डायनॉमिक ध्यान योग के माध्यम से सुषुप्त केंद्रों को जागृत करने की विधि समझाई। सुबह के ध्यान में ज्ञान, हुं मंत्र जाप, रेचन विधि, व्यायाम और नृत्य के जरिए साधकों को ऊर्जा और जागरण का अभ्यास कराया गया।
दूसरे सत्र की शुरुआत स्वामी शैलेंद्र सरस्वती ने की। उन्होंने साधकों से जीवन के लक्ष्य पर चिंतन करने को कहा। किसी ने आनंद, किसी ने मुक्ति, किसी ने मोक्ष, तो किसी ने सुख-शांति और समृद्धि को लक्ष्य बताया। उन्होंने समझाया कि तन-मन के लिए धन और साधन आवश्यक हैं तथा धर्म जीवन को संतुलन देता है। ध्यान भी एक साधन है, जबकि मोक्ष आध्यात्मिक साधना का लक्ष्य है। उन्होंने बताया कि ओशो ने नव-संन्यास की परंपरा दी, जिसमें संसार में रहकर घर, कामकाज और जिम्मेदारियों के साथ आध्यात्मिक मार्ग पर चलना संभव है। कबीर, नानक, रामकृष्ण परमहंस जैसे संतों के उदाहरण देते हुए उन्होंने जीवन में “सोहम” साधना, साक्षीभाव और सांसों के माध्यम से ध्यान की महत्ता बताई। मां प्रिया के गीत पर सोहम ध्यान कराया गया जिससे साधकों को गहन और अलौकिक अनुभव प्राप्त हुआ।
तीसरे सत्र में मां अमृत प्रिया ने मूलाधार से सहस्रार तक ऊर्जा के जागरण की प्रक्रिया समझाई। उन्होंने बताया कि जब ऊर्जा ऊंचे चक्रों तक पहुंचती है तो इंसान का रोम-रोम खिल उठता है। इस दौरान अश्विनी मुद्रा, अंतर कुम्भक, बाह्य कुम्भक, मूलबन्ध सहित विभिन्न साधनाएँ कराई गईं, जिससे साधकों को निर्विचार अवस्था का अनुभव हुआ और ध्यान की ऊर्जा सहस्रार की ओर प्रवाहित हुई।
आज के अंतिम चरण में पटना से आई मां रश्मि ने “भाव शुद्धि” का सत्र ओशो संध्या के रूप में कराया। सफेद वस्त्रों में नृत्य और उत्सव के माध्यम से साधकों ने ऊर्जा, आनंद और मुक्त भाव का अनुभव किया। कार्यक्रम में स्वामी मनोज, स्वामी अनिल, स्वामी अजय, शिव श्याम, स्वामी यादव, मां दीपा वर्मा सहित अनेक ओशो मित्र उपस्थित रहे। सहयोग में कमल बगड़िया, सुरेश बगड़िया सहित कई साधक विशेष रूप से जुड़े हुए हैं। मां मीना भी आयोजन व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।