हालांकि, इस फैसले के साथ ही एक बड़ा सवाल रामगढ़ को लेकर खड़ा हो गया है। वर्षों से यहां के जनप्रतिनिधि मेडिकल कॉलेज की स्थापना का आश्वासन देते रहे हैं, लेकिन अब तक यह सपना अधूरा ही है। आखिर हर बार रामगढ़ का नाम पीछे क्यों रह जाता है और इस मुद्दे पर जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी चर्चा का विषय बनती जा रही है। उक्त सवाल रामगढ़ के जाने माने बुद्धिजीवि व समाजसेवी बसंत हेतमसरिया ने उठाया है।
उन्होंने कहा कि राज्य में सत्तारूढ़ इंडिया गठबंधन ने 2024 विधानसभा चुनाव के दौरान अपनी सात प्रमुख गारंटियों में हर जिला मुख्यालय में मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज और विश्वविद्यालय स्थापित करने का वादा किया था। लेकिन सरकार बनने के करीब 16 महीने बाद भी रामगढ़ जिले को लेकर ठोस प्रगति नजर नहीं आ रही है। श्री हेतमसरिया ने कहा कि खास बात यह भी है कि यह जिला राज्य के शीर्ष नेतृत्व से जुड़ा हुआ माना जाता है, ऐसे में यहां विकास की गति और तेज होने की उम्मीद थी।खास बात यह भी है कि यह जिला राज्य के शीर्ष नेतृत्व से जुड़ा हुआ माना जाता है, ऐसे में यहां विकास की गति और तेज होने की उम्मीद थी।
साथ ही कई स्थानीय लोगों का भी कहना है कि रामगढ़ को कम से कम वह सुविधाएं तो मिलनी ही चाहिए, जिसका उससे वादा किया गया था।
रामगढ़ में पहले से एक इंजीनियरिंग कॉलेज पीपीपी मोड में संचालित है, लेकिन उसकी गुणवत्ता को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में केवल संस्थानों की संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है।
इतिहास गवाह है कि रामगढ़ को जिला बनाने की मांग भी लंबे समय तक नजरअंदाज की गई थी। जब खूँटी को जिला घोषित किया गया, तब रामगढ़ के लोगों का आक्रोश आंदोलन में बदल गया था। आखिरकार जनदबाव के चलते वर्ष 2007 में रामगढ़ को अलग जिला बनाना पड़ा।
आज एक बार फिर उसी तरह की उम्मीदें और सवाल सामने हैं। अब देखना यह होगा कि सरकार रामगढ़ की इस बहुप्रतीक्षित मांग पर कब तक निर्णय लेती है और जिले के लोगों को उनका हक कब मिलता है।